(9) जीव
आछेमन समस्त प्राणीर ह्मदयत।
ईश्वरर प्रतिबिाम्ब लागिछेमनत।। (66)
ताके बुलि जीव मन एरे भिन्न नुइ।
एक पिड भैला येन लोहा अग्नि दुइ।।
मने दुख पाइले जीवे बोले मञि पाओ।
मने यैक याञो बोले मञि याओ।(67)
(श्रीमदभागवतः तृतीय स्कन्ध, अनादि पातन)
रहता है मन समस्त प्राणीयों के ह्मदय में,
ईश्बर का प्रतिबिम्ब प्रकट होता है मन में। (66)
आत्मा युक्त शरीर को करते है जीव, हो जो मन से अभिन्न,
जैसे होता है लोहा आग मिलके एक ही अग्नि पिंड।
मनको दुखी होने से जीवन कहे मै दुःखी हूँ,
मन जहाँ जाये जीव कहे मैं वहाँ जाऊ। (67)
(10) आत्मा
नाहि जन्म पूर्बतो अद्यापि नोहे जात।
अजर अमर तुमि आत्मासे साक्षात। (204)
देहते आक्षाहा मात्र तुमि देह हीन।
येन अग्नि थाकन्ते काष्टतो करि भिन्न।।(205)
(श्रीमद्भागवतः द्वादश स्कन्ध, ब्राहृज्ञान कथन)
