जिनका जन्म न था कभी और न होगा कभी, तुम ही तो साक्षात हो आत्मा अविनाशी। (204) शरीर में रहते हो मात्र, परंतु तुम हो शरीर विहीन, जैसे अग्नि वसे काष्ठ में और काष्ठ-अग्नि दो है भिन्न।।(205)

(11) जन्म-मृत्यु
ब्राहृा आदि करियत आछेप्राणीचय।
समस्तरे होवे निते उतपत्ति प्रलय।। (156)
(श्रीमद्भागवतः द्वादश स्कन्ध, प्रलय कथन)
ब्राहृा आदि को लेकर जितने है प्राणीगण,
होता हैं निश्चित ही सबका जन्म और मरण। (156)
(12) माया
अबस्तुक देखावय बस्तुक आवरि।
एहिसे मोहोर माया जाना निष्ट करि।। (229) (श्रीमद्भागवतः द्वितीय स्कन्ध)

सत्य को ढककर असन्य को दिखाना ही माया, (हे ब्राहृा) जानलो यह निश्चित। (229)

(13) साधु

शक्ति अनुरुपे करय सबाको
उपकार साधु नरे।
महा क्षमा शील सहनशील
असूया काकों नकरे।।
(संस्कृत भक्ति रत्नाकर का अनुवादः रत्नाकर भाष्य)
शक्ति अनुरुप करते हैं सबका उपकार
साधु मनुष्यों ने,
होते हे वे महा क्षमाशील और सहनशील,
और किसी से हिंसा द्वेष करते नहीं।