(14) साधु संग
काणत कहन्त कथा कृष्णे गोप्य करि।
नाहिके उपाय सखि सुसंगक सरि।।
आहृाक नपावै पुणु जानी कर्मीलोक।
साधु संगे अवश्येके बश्य करे मोक।। (178)
(श्रीमदभागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
उद्धवजी के कान में भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः
उपायों मे कोई भी नहीं सतसंग सम, हे सखा।
ज्ञानवादी और कर्मकांडी मुझको पाते नही,
सतसंग ही मुझको निश्चित फ्रानाते आज्ञाकारी।(178)
(15) आचरण
गुणत अधिक यिटी आपोनात करि।
ताकी देशि प्रीति आति करिब सादरि।।
नकरिब कदाचितो ताहाक असूया।
गुणाधम जन देखि करिबेक दाया।।
समाने सहिते यिटो मित्रता करय।
संसारर तिनि तापे ताक नुचुवय।।
(श्रीमन्त शंकरदेव रचित संस्कृत भक्ति रत्नाकर का अनुवादः रत्नाकर भाष्य)
जो व्यक्ति है गुण में स्वयम से भी अधिक,
उनके प्रति करो आदर अधिक से अधिक।
उनके प्रति हिंसा का भावना रखना नहीं कदाचित,
और गुणाधम जन के प्रति दया है उचित।
करते है जो मित्रता बराबर के प्रति,
संसार के त्रय-ताप उनको करता नहीं स्पर्श कदाचित।
