(16) सत्य
सत्ये नेइ उद्र्धक असत्ये अधोगति।
हेन जानि सत्यक राखिबे करा मति।। (262) (हरिशचन्द्र उपाख्यान)
सत्य मार्ग से उन्नति होता, असन्य मार्ग में है अवनति,
यह जानकर सत्य रक्षा मे रखो मति। (262)
(17) धैर्य
कार्य समयत केने भैला हत बुद्धि।
आपद ब्याधिर होवै धैर्येसे औषधि।। (258) (हरिशचन्द्र उपाख्यान)
कार्य समय में क्यों हुए भष्ट-बुद्धि आपद- रोग का धैर्य है परम औषधि। (258)
(18) अतिथि सेवा
अतिथिक नेदि किबा करिलि भोजन।
सिजिल पातेक किवा अगम्यागमण।।(748)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
अतिथि को वंचित करके कर लिए भोजन,
अगम्यागमण के समान पाप कर लिए अर्जन। (748)
(19) दुर्जन
दुज्र्जनर हेन केनय चरित्र
पावे धरि उठे कान्धे।
चला फाड़ि पाचल जाबाबे सिभिति
गलत धरिया कान्दे।।(847)
(श्रीमद्भागवतः अष्टम स्कन्ध, अमृत मथन)
दुर्जन का है कैसी चरित्र
पेर पकर के चढ़ जाते हैं कंधे पर,
क्षण में ही करता हैं विश्वासघात
और रोता हैं गले लग कर। (847)
