(20) क्षमा
मोत चित्त दिया यिटो जन महाशय।
हानि अपमान दुःख शोकक सहय।।
तारे नाम क्षमा आवे जानिवा उद्धव।
क्षमावंत पुरुषर नाहि पराभव।।(216)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
रखते हैं चित्त मुझमें (कृष्ण में) जो सज्जन,
हानि अपमान दुःख शोक करते हैं सहन,
इसीका नाम हैं क्षमा, जान लो हे उद्धव,
और क्षमाशील जन हैं अपराजेय।(216)
(21) पंडित
ब्रााहृणर चन्डालर निबिजारि कुल।
दातात चोरत येन दृष्टि एकतुल।।
तीचत साधुत यार भैल एकज्ञान।
ताहाकेसे पण्डित बुलिय सर्बजन।(1821)
(कीर्तन घोषाः श्रीकृष्णर बैकुन्ठ प्रयान)
ब्रााहृण या चंडाल कुल के विचार नहीं करते जो,
रखते हे सम दृष्टि दाता और चोर में जो,
हो गये है जिनका नीच या साधु में एकज्ञान,
कहते हैं पण्डित उनको ही सर्व जन। (1821)