(21) मुर्ख
पुत्र दारा विषयक करै मात्र रति।
नलवै संतर संग मोत नाइ मति।।
यदि चारिवेद चैध्य शास्त्रत पार्गत।
तथापितो सेहि मूर्ख जाना मोर मन।।
(कीर्तन घोषाः श्रीकृष्णर फ्रौकुन्ठ प्रयान)
पुत्र पत्नी विषय में ही मात्र हैं रति,
करते नही सत संग और मुझ मे नही मति।
यदि हुआ चार वेद चौदह शास्त्रों में पार्गत,
तथापि वह है मूर्ख, जानो मेरा मत।
(22) युग-धर्म
सत्य युगे येन फल पावै ध्यान करि।
महा महायज्ञे त्रेता युगे यजि हरि।।
येन फल पावै पुजा करि द्वापरत।
पावै सवे फल कलि युगे कीर्तनत।। (413)
(श्रीमद्भागवतः दशम स्कन्ध, आदि भाग)
ध्यान से होता हैं फल प्राप्त सत्य युग में,
यज्ञ से होता है फल प्राप्त त्रेता युग में,
पुजा से होता है फल प्राप्त द्वापर युग में,
कीर्तन से सर्वफल प्राप्ति कलि युग में।(413)