(23) कर्म-संस्कृति
एक कृष्णदेव करियोकसेव
धरियो ताहान नाम।
कृष्ण दास हुया प्रसाद भूञ्जिया
हस्ते करा तान काम।। (श्रीमद्भागवतः द्वितीय स्कन्ध
एक कृष्ण देव को ही करो सेवा
धारन करो उसीका नाम,
हो कर कृष्ण की दास ग्रहण करके प्रसाद उनमे समर्पित
करते जाओ नित्य कर्म ईश्वर वांचित।
पन्द्रहवाँ अध्याय
प्रतिदिन अभ्यास के लिए नाम – प्रसंग का पद्धति
सम्पूर्ण भजन-कीत्र्तन (नाम-प्रसंग) पद्धति में सूवह, दोपहर और सन्ध्या काल के लिए पद्धति दिया गया हैं। श्रीमन्त शंकरदेव का समय से ही यह पद्धति चला आ राहा हैं। उनके शिष्य माधवदेव, दामेदरदेव, गोपाल आता आदि ने यह पद्धति को प्रतिपालन और प्रसार किया था। उस समय से आच तक श्रीमन्त शंकरदेव जी को गुरु मानके यह पद्धति पीड़ी दर पीड़ी चला आ राहा हैं अर्थात प्रचलित हैं।
शाम के समय भजन-कीर्तन में तोटय, चपय, लीलामाला आदि सब गाया जाता हैं ओर सूवह, दोपहर में यह सब नही गाया जाता हैं। सन्ध्या काल की नाम-प्रसंग का पद्धति को संक्षिप्त रुप में उल्लेख करना चाहता हुँ –
