(5) कीर्तन –
घोषा – जय हरि गोविन्द नारायण राम केशव हरि।
राम राम केशव हरि।
पद – प्रथमे प्रणामो ब्राहृ रुपी सनातन।
सव्र्व अवतारर कारण नारायण।।
तजुनाभि कमलत बहृा मौला जात।
युगे युगे अवतार धरा असंख्यात।।
मत्स्य रुपे अवतार भैला प्रथमत।
उद्धारिला वेद प्रभू प्रलय जलत।।
सत्यव्रत राजाक देखाइला निज माया।
नधरिला समुद्रे तोमार मत्स्य काया।।
कुर्म अवतार भैला क्षीरोदधि तीरे।
लक्ष प्रहरर पन्थ जुरिला शरीरे।।
करिलेक परि स्तुति सुरासुर नागे।
धरिला मन्दर गिरि प्रभू पृष्ठ भागे।।
दिब्य जज्ञ बराह स्वरुप भैला तुमि।
लीलाये दन्तर अग्रे उद्धारिला भूमि।।
तोमाक करिला युद्ध हिरन्याक्ष वीरि।
अप्रयासे दैत्यक मारिला दन्ते छिरि।।
आदि दैत्य हिरन्यकशिपु बलियार।
नरसिंह रुपे हिया बदारिला तार।।
करिला निर्भय पाइला तृदशे उल्लास।
भक्त प्रह्लादक प्रभू करिला आश्वास।।
बामन स्वरुपे अदितिर वाक्य पालि।
इन्द्रक थापिला चले बलिक निकालि।।
त्रैलोक्यक आक्रमिला चरणर गति।
तजु पादोदके गंगा भैला उतपति।।
(श्रीमन्त शंकरदेव रचित कीर्तन घोषा से लिया गया हैं)
