श्रीमन्त शंकरदेव का वंश परिचय –
शंकरदेव गुरुजन का चौथा पूर्वपुरुष चण्डीफ्रार उत्तर प्रदेश के कनौज (लखनौ) के रहनेवाले थे। तेरहवी शाताबदी में साहाबुद्दिन ने जब दिल्ली और कनौज आक्रमण किया, तब चण्डीबर ने बारह ब्रााहृाण और कायस्थ परिफ्राार साथ में लेकर कनौज त्याग करके गौर राज्य में उपस्थित हुए। गौर राज्य का राजा धर्मनारायण ने गुरुजन का जौथा उपरिपुरुष चण्डीबर को जमीन, घर, नाना तरह के उफहार प्रदान करके अपने राज्य में सम्मान सहित निवास करने दिया। चरित पुथि के अनुसार कमतापुर के राजा दुर्लभेश्वर और गौर राज्य (पश्चिम बेंगल) का राजा धर्मनारायन के फ्राीच में विवाद हुआ और बाद में मित्रता स्थापन हुआ। राजा दुर्लभेश्वर नें अपने राज्य कमतापुर (असम में अवस्थित) के लिए सात कायस्थ और सात ब्रााहृण परिबार मांगा और गौर नरेश धर्मनारायन नेभी मित्रता स्थापना की इच्छा से सहमत प्रकट किया। कायस्थ लीग सर्वप्रथम असम के लंगामागुरि में निवास किए और बाद में असम राज्य के नगाओ जिला के बरदोवा अंचल मे निवास किए।
महापुरुष श्रीमन्त शंकरदेव जी के पिता थे कुसुम्बर शिरेमणि भूञा। कुसुम्बर के पुर्वपुरुष थे सूर्यबर। सूर्यबर के पूर्वपुरुष थे राजधर और राजधर के पूर्वपुरुष थे चण्डीबर। भूञा लोग कायस्थ कुल के होते है। कायस्थ का स्थान हैं ब्रााहृण और श्रत्रिय के बीच में। कायस्थ लोग जमिनदार, अर्थात भूमि का मालिक, दश्र प्रशासक और बौद्धिक श्रेत्र में निपुन था। पश्चिम बांगाल में भौमिक, असम में भूञा, उत्तर प्रदेश, बिहार में श्रीवास्तव और नेपाल में कायस्थ लोग जैसि ताइतेल या उपनाम से विदित हैं।
अठारह वर्ष से लेकर एकत्तिस वर्ष के उम्र तक –
महेन्द्र कन्दलि के संस्कृत पाठशाला में छः वर्ष शिक्षा ग्रहण करके सतरह वर्ष उम्र में घर वापस लौटे। समाज में जव सास्त्र का विश्लेषण होता, तब शंकरदेव ने बौकुन्ठ के सम्बन्ध में वर्णन किया था। तब समाज के अनुरोध से शंकरदेव ने वैकुन्ठ-ज्ञान प्रदान करने के लिए 1468 ॠक़् (खृष्टाव्द) में चिह्नयात्रा नाटक रचना कर के टेम्बुवनी नामक स्थान में प्रदर्शन किया। श्रीमन्त शंकरदेव गुरूजन ने छः अंकीया नाटक ब्राजावली (ब्राजभाषा) भाषा में रचना किया था। चिह्नयात्रा नाटक भी गीत-नृत्य-वाद्य-संलाप और अभिनय से परिपूर्ण एक पूर्णाग नाटक है। यह नाटक प्रदर्शन करने के लिए गुरुजन ने गीट-नृत्य के उपरान्त भी वाद्य-यन्त्र खोल और ताल सृष्टि किया था। अतःएव श्रीमन्त शंकरदेव ध्रुपदी श्रेत्र में विश्व के प्रथम कम उम्र के (उन्निस वर्ष उम्र में चिह्नयात्रा नाटक लिखा था) नात्यकार, प्रथम निर्देशक, स्वयम् ही सूत्रधारी नृत्य प्रदर्शन करनेवाले प्रथम अभिनेता, प्रथम गीतकार, सुरकार तथा गायक हैं। इस सम्बन्ध में क्ष्.ॠ.च्. ग्र्ढढत्त्ड़ड्ढद्ध क्.क़्. च्र्द्धत्द्रठ्ठद्यण्त् (कन्. च्ड्ढड़न्र्. द्यदृ द्यण्ड्ढ क्तदृद’डथ्ड्ढ घ्द्धड्ढद्मत्ड्डड्ढदद्य दृढ क्ष्दड्डत्ठ्ठ) ने उनकी गवेषणामूलक ठ्ठद्धद्यत्ड़थ्ड्ढ ‘ॠ दड्ढध्र् थ्त्ढ़ण्द्य दृद द्यण्ड्ढ ड्ढठ्ठद्धथ्न्र् एद्धठ्ठत्र्ठ्ठडद्वथ्त् थ्त्द्यड्ढद्धठ्ठद्यद्वद्धड्ढ’ में उल्लेख किया कि “च्द्धत् च्ण्ठ्ठत्त्ठ्ठद्ध क़्ड्ढध्ठ्ठ ध्र्ठ्ठद्म ददृद्य दृदथ्न्र् द्यण्ड्ढ ढत्द्धद्मद्य ठ्ठथ्र्दृदढ़द्मद्य द्यण्ड्ढ एद्धठ्ठत्र्ठ्ठडद्वथ्त् ड्डद्धठ्ठथ्र्ठ्ठद्यत्द्मद्य डद्वद्य ठ्ठथ्द्मदृ द्यण्ड्ढ थ्र्दृद्मद्य द्रदृध्र्ड्ढद्धढद्वथ् ड्डद्धठ्ठथ्र्ठ्ठद्यत्द्मद्य ठ्ठदड्ड द्रदृड्ढद्यद्धन्र् ध्र्द्धत्द्यद्यड्ढद्ध दृढ डद्धठ्ठत्र्ठ्ठडद्वथ्त्.”
गुरु श्रीमन्त शंकरदेव ने इक्किस वर्ष उम्र में सूर्यवती को विवाह किया और विवाह के तीन साल पश्चात मनु नामक कन्या संतान जन्म हुइ। मनु की नौ महीना उम्र मैं ही सूर्यवती का देहान्त हुआ। शिशु मनुकी पालन-पोषण किया खेरसुती और चन्डरी ने। मनु की उम्र सात साल होने पर हरि नामक एत कायस्थ युवक के साथ विवाह कर दिया।
प्रथम तीर्थ भ्रमण –
महापुरुष श्रीमन्त शंकरदेव ने बत्तिस वर्ष उम्र में, अर्थात 1481ॠक़् (खृष्टाव्द) मे सतरह जन शिष्य को साथ में लेकर तीर्थ भ्रमण करने निकल पड़े। जगन्नाथ श्रेत्र, मथुरा, वृन्दावन, हस्तिनापुर, हरिद्वार, द्वारका, वदरिकाश्रम, काशी, नेपाल और दक्षिणी राज्यों के सेतुवन्धन पर्यन्त भ्रमण करके 1493 ॠक़् (खृष्टाव्द) मे बरदोवा लौटे।
उस समय से समग्र भारतवर्ष में मूर्ति-पूजन, बलि-विधान, कुमारी-पूजा, अस्पृश्यता आदि कु-संस्कार तथा प्रचलित अन्धविश्वास ने भारतीय समाज को पूर्णरुप से ग्रासित किया था। भारतीय संस्कृति दिशाहीन हो गया, क्योकि उस समाज में प्रचलित अन्धविश्वास, कुसंस्कारपुर्ण लोकाचार को ही जनगण पवित्र धर्म और संस्कृति के रुप में मान के चलते थे। बारह वर्ष की तीर्थ भ्रमण काल में गुरुजन ने उस समय के समाज में प्रचलित अन्धविश्वास केन्द्रीक कुसंस्कारों को स्वयस् ही प्रत्यक्ष किया था। गुरुजन तीर्थ भ्रमण के समय में ही भारतीय धर्म और संस्कृति को एक संस्कारित रूप देने के लिए प्रतिज्ञावद्ध हुए और उत्तर भारत में ब्राजाभाषा में घोषणा किया इस तरह से –
धूं : मन मेरी राम चरणेहि लागु।
तइ देखना अन्तक आगु।।
पद : मन आयु क्षणे क्षणे टुटे।
देह प्राण कोनदिन छुटे।।
……………………………
इसी तरह शंकरदेव ने उनकी पूर्वपरुष के स्थान उत्तर भारत में ही एक शरण हरि नाम धर्म को केन्द्रविन्दु करके परिशोधित भारतीय संस्कृति प्रतिष्ठा के लिए तृतीय पदक्षेप ग्रहण किया था। प्रथम पहल था करतल कमल कमल दल नयन ……………….और द्वितीय पहल या पदक्षेप था चिह्नयात्रा नाटक रचना तथा प्रदर्शन। इस में महत्वपूर्ण यह हैं कि श्रीमन्त शंकरदेव विश्व इतिहास में उच्चतम गुण सम्पन्न प्रथम ध्रुपदी गायकार और गीतकार हैं। उनके समय में भारतवर्ष के असम, वेंगल, उरिष्या, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि लगभग सफ्रा क्षेत्र में ब्राजभाषा संयोगी भाषा के रुप में था। इसी कारण शंकरदेव ने ब्राजभाषा में अंकीया नाटक और फ्रारगीत रचना के जरिए भारतीय संस्कृति को शक्तिशाली रुप में प्रतिष्ठा करने के लिए संकल्प लिया था। तीर्थ भ्रमण काल में पुष्कर तीर्थ के कवि गोपीनाथ, वृन्दावन के राधा सन्यासी, कालिन्दी के निकट रहनेवाला रुप सनातन, वृन्दावन दास, उप द्वारका के राम क्षत्रिय आदि विद्वान पुरुषों ने महापुरुष श्रीमन्त शंकरदेव जी को गुरु मान के भगवन्त कृष्ण में शरण लिए थे। उसके उपरान्त भी जगन्नाथ क्षेत्र में एक वर्ष काल रह कर भक्त समाज में ब्राहृपुरार्ण के व्याख्या करके सफ्राको मोहित किया था।
इसी तरह फ्राारह वर्ष काल तीर्थ भ्रमण करको घर वापस आए और कुछ वर्ष पश्चात ज्ञाति-कुटुम्ब के अनुरोध से चौवन वर्ष उम्र मे कालिन्दी को विवाह किया। तत् पश्चात एक शरण हरि नाम धर्म का प्रतिष्ठाता, प्रवर्तक श्रीमन्त शंकरदेव ने उनका सिद्धान्त का व्यापक प्रचार के लिए कार्य-सूची प्रस्तुत किया और यह कार्यसूची को पूर्णरुप देने के लिए वे असम के अनेक स्थान जैसे रौता, गांमौ, माजुली के धोवाहाता बेलगुरि, कुमार कुछी, पाटबाउसी और कोचफ्रिाहार का मधुपुर क्षेत्र में निवास करके उस अंचलों के प्रजागण को एकत्रित किए थे। एक शरण हरि नाम धर्म का प्रचार के लिए उन्होने नामघर और थान सृष्टि किया था। यह नामघर और थान हैं शंकरी धर्म, शंकरी संस्कृति का चर्चा और प्रदर्शन का केन्द्रस्थान। महापुरुष श्रीमन्त शंकरदेव के शिष्यगण जैसे माधवदेव, हरिदेव, दामोदरदेव के वैकुन्ठ प्रयाण के पश्चात थान समूह को सत्र नामकरण किया गया। शंकरदेव और उनकी समय की शिष्यगण के काल में थान समूह को पाटबाउसी थान, गंमौ थान, बेलगुरि थान के नाम से जाना गया था।
प्रचलित कुसंस्कार, अन्धविश्वास आदि को दूर करके एक शरण हरि नाम धर्म प्रतिष्ठा के समय में श्रीमन्त शंकरदेव को राजा-प्रजा दोनो पक्ष से तीव्र विरुद्ध आचरण का सामना करना पड़ा। परन्तु वे कृष्णस्तु भगवान स्वयर्म् यह सत्यवाणी को लेकर तीव्र साहस के सहित अपने लक्ष की ओर आगे बड़े।