स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन

शरीरमाद्यम् खलु धर्म साधनम् – अर्थात धर्म आचरण के लिए प्रथम आवश्यकता है स्वस्थ शरीर। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिकभाव से स्वस्थ शरीर प्राप्त होता हैं एक मात्र प्राणायाम द्वारा। साँस की गतिको छन्दमय करके मानव जीवन को स्वस्थ और दीर्घायु बनाने का पद्धति को प्राणायाम कहा जाता हैं। अर्थात् साँस की गति को नियन्त्रण करने का पद्धति को ही प्राणायाम कहा जाता हैं।
पतञ्जलि ऋषि ने उनका योग शास्त्र में अष्टांग योग के सम्बन्ध में व्याख्या किया हैं और अष्टांग योग हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारण और समाधि। पतञ्जलि मुनि का योग शास्त्र को अनुसरण करके योग गुरु स्वामी रामदेवजी महाराज ने रोगमुक्त विश्व रचना के लिए प्रितज्ञावद्ध हुए। बिहार राज्य में यादव वंश में जन्म ग्रहण करनेवाला यह योग गुरु ने विश्व का प्रतिजन का ह्मदय में स्थान प्राप्त किया हैं। रामदेवजी महाराज हैं धर्म और विज्ञान का समन्वय रक्षाकारी और वे धर्मीय अन्धविध्वासों का घोर विरोधी। उनका मत अनुसार धर्म हैं विज्ञानसन्मत और अन्धविश्वासहीन एक शुद्ध जीवन धारण पद्धति। रामदेवजी महाराज निःसन्देह आज समग्र भारतवर्ष के लिए गौरव का कारण हैं।
श्रीमन्त शंकरदेव ने नियमित रुप से प्राणायाम किए थे और इसीलिए स्वस्थवान होकर एक सौ उन्नीस साल उम्र तक जीवित थे। चक्रपाणि वैरागी और भूषण द्विज ने गुरु चरित में इस सम्वन्ध में उल्लेख किए थे। प्राच्य पण्डित ड. महेश्वर नेओग ने गुरु चरित के आधार में रचित श्रीश्रीशंकरदेव नामक ग्रन्थ में उल्लेख किया –
शिक्षागुरु महेन्द्र कन्दलि का संस्कृत पाठशाला में रहते समय में शंकरदेव ने योग शास्त्र अध्ययण और योग अभ्यास किए थे और इस विषय में पारदर्शिता प्राप्त किए थे। श्रीमन्त शंकरदेव गुरुजन ने प्राणायाम, कुण्डलिनी शक्ति आदि का सम्वन्ध में भागवत, भक्ति रत्नाकर आदि शास्त्र में अस तरह उल्लेख किया –
सुषुम्ना आछय मेरु मज्जार भितर।
जात वायु पशिले अजर होवे नर।।
ताहार मुखत ढाकि आठे कुण्डलिनी।
मायार शकति जेन देखिया सर्पिनी।।