ऐसा भी प्राणायाम हैं जिलका अनुशीलन करने से इच्छामृत्यु प्राप्त होता हैं। सुषुम्ना में अर्थात् स्पाइनेल कर्ड में वायु प्रवेश करने से मनुष्य अमर होता हैं। गुरुजन एकसौ उन्निस वर्ष उम्र तक स्वस्थवान हो कर जीवित थे और इसका गुप्त रहस्य है एक मात्र प्राणायाम और सात्विक भोजन। श्रीमन्त शंकरदेव ने दिया हुवा नाम प्रसंग अर्थात् हरि नाम कीर्तन का पद्धति, वरगीत गायन शैली और शंकरी नृत्य का माटि आखरा और नृत्य समूह प्राणायाम तथा योगसाधना की साथ सम्पर्क रहनेवाला विषय हैं। कारण इस सम्बन्ध में साँस का नियन्त्रण अति महत्वपुर्ण हैं। साँस का गति नियन्त्रण नही होने से नाम प्रसंग करना, वरगीत या क्लाछिकेल गीत या आधुनिक गीत और नृत्य प्रदर्शन असम्भ हैं। मनुष्य का हाथ और अंगुलीया में शरीर के सभी अंग प्रत्यंग के लिए द्मद्यत्थ्र्द्वथ्ठ्ठद्यत्दढ़ ड़ड्ढदद्यद्धड्ढ रहता हैं। तालि बजाके नाम प्रसंग (नाम कीर्तत) करने से थ्द्वदढ़द्म से लेकर ण्ड्ढठ्ठद्धद्य, थ्त्ध्ड्ढद्ध, द्रठ्ठदड़द्धड्ढठ्ठद्म, त्त्त्ड्डदड्ढन्र्, ड्ढदड्डदृड़द्धत्दड्ढ ढ़थ्ठ्ठदड्डद्म आदि सभी अंग स्वस्थ रहता हैं और साथ साथ शरीर और मन भी स्वस्थ रहता हैं।
खाद्याभ्यास – खाद्य तीन प्रकार कै हैं, सात्विक, राजसिक और तामसिक। जो खाद्य शरीर का श्रीवृद्धि कारक, स्वस्थ मन के कारक और जो खाद्य रोग का कारक नही हैं उस प्रकार के खाद्य को सात्विक खाद्य या आहार कहा जाता हैं। जो खाद्य मेद (ढठ्ठद्यद्म) वृद्धि करते हैं, जो मसालायुक्त हैं और रोग का कारक हैं उस प्रकार के खाद्य को राजसिक खाद्य कहा जाता हैं। उच्छिष्ट, चड़ा हुआ और वासी तथा पुराना खाद्य को तामसिक खाद्य कहा जाता हैं।
सात्विक खाद्य का अन्तर्गत खाद्य समूह है ताजा फल-मुल, शाग-सब्जि, माह जातीय खाद्य और दुग्ध। सात्विक खाद्य का तीन उल्लेखनीय गुण हैं और यह सब हैं – इस प्रकार के खाद्य जल्दी हजम होता हैं, शरीर का पुष्टिकारक हैं और यह खाद्य मुक्त मौल (ढद्धड्ढड्ढ दृन्न्र्ढ़ड्ढद थ्र्दृथ्ड्ढड़द्वथ्ड्ढ ) सृष्टिकारक नहीं हैं। मुक्त मौल शरीर का कोष ध्वंसकारी हैं और ड्डड्ढढ़ड्ढदड्ढद्धठ्ठद्यत्ध्ड्ढ ड्डत्द्मड्ढठ्ठद्मड्ढ का कारक हैं। यह उल्लेखनीय हैं कि उद्भिदज खाद्य और दुग्ध में मुक्त मौल विरोधी पदार्थ (ठ्ठदद्यत्-दृन्त्ड्डठ्ठदद्य) रहता हैं और शरीर को नाना प्रकार के रोग से रक्षा करता है और स्वस्थता प्रदान करता हैं।