श्रीमंत शंकरदेव ने प्रसाद का प्रचलन किया था और इस प्रसाद काउपादान समूह है बुट (ढ़द्धठ्ठथ्र्), मगु, केला, नारियल और अदरक। और यह उल्लेखनीय हैं की निरामिष खाद्य उत्तरम खाद्य। उद्भिदज खाद्य और दुग्ध है सात्विक आहार। और इसिलिए गुरुजन प्रसाद और निरामिष आहार के जरिए सात्विक तथा निरोगी विश्व निर्माण का संकल्प लिया था। शास्त्रसन्मत और विज्ञानसन्मत रुप से भी निरामिष आहार को उत्तम आहार माना गया हैं। श्रीमंत शंकरदेव ने कहा था कि निरामिष आहार हैं शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वस्थ रक्षाकारी। किन्तु ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्ति के लिए खाद्याभ्यास कभी भी प्रतिबन्धक या वाधक नहीं हो सकता। एक बार वे शिष्यगण के साथ एक गाँव में प्रवेश करके एक शरण हरिनाम धर्म का महिमा गाँववासीओ को समझाया था। तब गाँववासी ने मांस और मदिरा त्याग करके यह धर्म लेने के लिए आपत्ति जताया। शंकरदेव ने गाँववासीओ को कहा था कि मेरा यह धर्ममत मांसाहारी, निरामिषाहारी, मदाही, ब्राहृावधी और जाति, धर्म, भाषा, वर्ग निर्विशेष सब के लिए ग्रहणीय हैं। कारण मेरा यह धर्ममत का उद्देश्य हैं अस्पृश्यताविहीन साम्यवादी मानव समाज निर्माण करना। शंकरदेव ने कहा कि तुमलोग अपना खाद्याभ्यास और दैनिक नाम कीर्तन यह दोनो को मत छोड़ना। सर्वशक्तिमान ईश्वर दया की सागर हैं और ईश्वर सबका मंगल करेगा। तब गाँववासीओ ने शंकरदेव को गुरु मानकर भगवन्त कृष्ण में शरण लिया। श्रीम्त शंकरदेव का ज्ञात था कि यह धर्ममत लेने के पश्चात अनुशीलन के जरिए करणीय और अकरणीय के सम्बन्ध में वह लोगो को अपने आप ज्ञान प्राप्त होगा। इस उदारता के कारण शंकरदेव का धर्म जनजाति, अजनजाति, भारतीय, अभारतीय आदि सभी लोगों ने श्रद्धासहित ग्रहण किया हैं। श्रीमंत शंकरदेव ने घोषणा किया था कि प्राणी कल्याण तत्व में ही ईश्वर तत्व रहता हैं। अर्थात् मानव जाति सहित चार प्रकार की जीवों का कल्यान साधन में ही ईश्वर आराधना का तत्व प्रतिफलित होता हैं –
जगतर पूण्य माने जाना निष्ट करि।
प्राणी उपकारर अल्पको नुहि सरि।।
हेन जानि प्राणीक अभय दिया दान।
बोला हरि हरि पाइबा बैकुन्ठत थान।।
(श्रीमन्त शंकरदेव रचित हरिशाचन्द्र उपाख्यान)