जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव (1449-1568 ॠ.क़्.)
और
महापुरुष माधवदेव (1489-1596 ॠ.क़्.) ता महामिलन
महापुरुष माधवदेव का आविर्भाव 1489 खृष्टाव्द में, असम राज्य का लखीमपुर जिला के अंतर्गत लेटेकुपुखुरी के निकट रंगाजान नामक स्थान में हरसिंह बरा के घर में हुआ था। माधवदेव के पिता का नाम था गोविन्दगिरि भूञा और मातृ मनोरमा। पिता गोविन्दगिरि भूञा बांलादेश के बन्डुका नामक अंचल के शासक प्रतापराय भूञा के अधीनस्थ उच्चपदस्थ पदाधिकारी थे। माधवदेव ने प्राथमिक शिक्षा आरम्भ किया था हरसिंह बराजी के संस्कृत पाठशाला में। उसके बाद पिता गोविन्दगिरि के साथ बन्डुका चले गये और बन्डुका में राजेन्द्र अध्यापक के संस्कृत पाठशाला में मात्र एक वर्ष काल शिक्षा ग्रहण किया और असमें कायस्थ वृत्ति, तर्कन्याय नीति आदि शास्त्र अध्ययन करके पाठशाला का शिक्षा समाप्त किए।
फ्रान्डुका में रहने के समय में ही माधवदेव का पितृ वियोग हुआ। तत् पश्चात सौतेला जेष्ट¬ भात्रृ दामोदर से बिदाइ लेकर माधवदेव ने असम के भराली डुबि में रहने वाले उनके बहनोइ गञापानि के घर में उपस्थित हुए और मातृ मनोरमा सेभी वही भेट हुआ।
माधवदेव थे शाक्त और दूर्गाभक्त। मातृ ती कठिन रोग के समय में माधवदेव ने दुर्गा देवी के संतुष्ठी के लिए एक बकरा बलि चड़ाने के लिए मन में सोचा था। दूर्गा पूजा के समय में बलि चड़ाने के लिए बकरा तलशाने के लिए फ्राहनोइ गञापाणि को कहा। तब गञापाणि ने बलि-विधान के विपक्ष में बोला और महापुरुष श्रीमन्त शंकरदेव का धर्ममत के बारे में अवगत करवाया। माधवदेव ने तब शंकरदेव जी के साथ तर्क करने की इच्छा प्रकट किया। तब 1522 खृष्टाव्द में गञापाणि के साथ माजुली के धोवाहाट बेलगुरि में उपस्थित हुए। परिचय होने के बाद ही तर्क युद्ध आरम्भ हो गया। माधवदेव आगम शास्त्रों के श्लोक से शक्ति पूजा का समर्थन करते गए और शंकरदेव निगम शास्तोंके श्लोक से माधवदेव के वचन का खन्डन करते गए। प्राच्य पण्डित डः महेश्वर नेओग का श्रीश्री माधवदेव नामक ग्रन्थ में उल्लेख हैं कि जगतगुरु श्रीमन्त शंकरदेव और महापुरुष माधवदेव के बीच में संस्कृत और प्राचीन असमीया भाषा में लम्बो समय तक तर्क हुआ। अन्त में श्रीमन्त शंकरदेव ने महापुराण अर्थात महाभागवत शास्त्र का चतुर्थ स्कन्ध का एकत्तिस अध्याय का महत्वपूर्ण श्लोक को गम्भीरता के साथ गाया –
यथातरोर्मूल निषेचनेन तृप्यन्ति तत् स्कन्धभुजोपशाखाः।
प्राणीपाहारच्च यथेन्द्रियानाम् तथैव सर्वाईनमच्युतेभ्य।।
अर्थात, वृक्ष के जड़ में पानी डालने से जिस तरह मूल-वृक्ष, शाखा-उपशाखाए तृप्त होते है, और जिस तरह जीव के खाद्य ग्रहण करने के इन्द्रिय समूह तृप्त होते हैं, उसी तरह अच्युत अर्थात कृष्ण को आराधना करने से समस्त का अर्थात समस्त देव देवीओं का आराधना हो जाता हैं। शंकरदेव जी का सर्वशास्त्र सम्मत एकमत वाणी ने माधवदेव के चित्त को स्पर्श किया और वे शंकरदेव जी के चरण में आश्रित हो कर फ्राोले –
पहले मैंने आपको जो प्रणाम किया, वह किया था बरभूञा पद को सम्मान करके और अब जो प्रणाम किया यह आपके अभय चरण में अपने को बिक्रय करके और आपको गुरु मानके (गुरु चरित कथा के आधार में डः महेश्वर नेओग द्वारा रचित श्रीश्री माधवदेव नामक ग्रन्ठ से)। इसी तरह माधवदेव ने श्रीमन्त शंकरदेव को गुरु मान के एक शरण हरि नाम धर्म का प्रचार और विस्तार के लिए अपने आपको समर्पित कर दिया। जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव और महापुरुष माधवदेव का यह महामिलन मिण-कांचन सन्योग के नाम से सर्वजन विदित हैं।
