द्वितीय बार तीर्थ भ्रमणः
जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव ने सन्तानबबो (97 न्र्ड्ढठ्ठद्धद्म दृढ ठ्ठढ़ड्ढ) वर्ष की उम्र में एक सो विस जन भक्तो को साथ में लोकर पाटबाउसी से द्विताय फ्राार तीर्थ भ्रमण के लिए निकल पड़े। इस यात्रा में उनका प्रपन्न शिष्य महापुरुष मादवदेव भी साथ में थे। मात्र जगन्नाथ क्षेत्र भ्रमण करके छः महीने में ही पाटबाउसी वापस लौटे।
िबरल अर्थात दुर्लभ सृष्टि वृन्दावली वस्त्रः
चरितपुथि के आधार में रचित डः महेश्वर नेओग का श्रीश्री माधवदेव नामक ग्रन्थ के अनुसार, कोचबेहार राज्य का राजा नरनारायण के अनुरोध से श्रीमन्त शंकरदेव ने बरपेटा जिला के ताँतीकुछि में रहने वाले ताँती-मरल लोगो के द्वारा लाल, सफेद, काला, पीला, हरा, श्याम रंग के धागों से एक सौ बिस हाथ लम्बा कपड़ा में श्रीकृष्ण का वृन्दावन-लीला के चित्र नाना रंगके धागों से ही अंकित किया था। गुरुजन स्वयम् ही उपस्थित रहकर ताँती लोगों को वस्त्र में धागों से छवि अंकित करने और अक्षर अंकित करने के लिए सिखाया था। यह काम सम्पूर्ण करने के लिए गुरुजन ने कभी कभी पैदल ही रंगियाजान होकर कुमारकुछि से बरपेटा पहुँच जाते थे और स्वयम् ही वृन्दावनी वस्त्र का निर्माण कार्य का निर्देशन करते थे।
यद वृन्दावनी वस्त्र का निर्माण-कार्य द्वारा गुरुजन ने विश्व इतिहास में कुटीर उद्योग ( क्दृद्यद्यठ्ठढ़ड्ढ क्ष्दद्मड्डद्वद्मद्यद्धन्र्) का शुभारम्भ करके साधारण प्रजा के आर्थिक और सामाजिक प्रगति की दिशा में शक्तिशाली पदक्षेप ग्रहण किया था। वृन्दावनी वस्त्र मं अंकित किया गया श्रीकृष्ण के लीला का कलात्मक उतक्रिष्टता, उस समय की भारतीय समाज व्यव्स्था ऐतिहासिक पटभूमि आदि का विश्लेषण होने से यह वृन्दावनी वस्त्र विश्व के आश्चर्य वस्तु समूह में अन्तर्भूक्त होगा। राज्य तथा भारत सरकार इस सम्बन्ध में चिंतन करने से भारतवर्ण का गौरव दोगुणा वृद्धि होगा। वृन्दावनी वस्त्र अभि भी लन्डन के विक्टोरिया संग्रहालय में संकक्षित हैं।
कृषि आधारित अर्थनीति और कुटीर उद्योग के प्रितष्ठाताः
महापुरुष शंकरदेव ने एक शरण हरि नाम धर्मको केन्द्र विन्दु करके धर्मनीति और अर्थनीति के शिक्षा समान्तराल रुप से प्रदान किया था। क्योकि शंकरदेव ने उपलबिध किया था कि धर्म है भरे पेट का भोजन। मुखे मनुष्य को धर्मीय दर्शन का उपदेश ग्रहण करने की धैर्य नही होती।
दरिद्रता ने ग्रासित किए हुए मनुष्यों को धर्म संस्कार की बड़ी बड़ी बाते कहने का मतलव हैं प्रज्जलित अग्नि में घी डालना। इसीलिए गुरु श्रीमन्त शंकरदेव ने कर्मसंस्कृति सृष्टि करने के लिए गाँव-गाँव में चाना-मुंग का खेती करने के लिए परामर्श दिया था। इस कारण से ही सभी गाँवो में धान, सर्सो के खेती के साथ साथ चाना-मुंग की खेती का भी प्रचलन बढ़ने लगा। उस समय जनगण को आवश्यक खाद्य स्वयम् ही उत्पादन करने के अलवा दुसरा उपाय नही था। क्यो कि गुरुजन के समय में अन्य राज्यों से असम के लिए अन्डा, चावल, चाना-मुंग आदि का आयात नही होता था। नामघर निर्माण के लिए आवश्यक बाँस-बेत-खेर और नाम-कीत्र्तन के लिए आवश्यक टोकरी आदि निर्माण करने के लिए जो बाँस-बेत की जरुरत होती थी वह सब गाँव-गाँव में खेत के चरिए उत्पादन किया गया था। और समान्तराल रुप से नाम-कीर्तन के लिए आव्श्यक खेल, ताल आदिका निर्माण कार्य से क्षुद्र क्षुद्र कुटीर उद्योग समूह प्रितष्ठा हुए थे। अतः एव देखा गया कि श्रीमन्त शंकरदेव ने एक शरण हरि नाम धर्म को केन्द्रविन्दु करके कर्म-संस्कृति के जरिए भारतवर्ष में हारियाली बिप्लव ( क्रद्धड्ढड्ढद द्धड्ढध्दृथ्द्वद्यत्दृद) और कुटिर उद्योग का प्रतिष्ठा किया।
