जगत गुरु श्रीमंत शंकरदेव का अमृत सिद्धांत
तोटय
मधु दानव दारण देववरं।
वरवारि जलोचन चक्रधरं।।
धरणी धर रणध्येयपरं।
परमार्थ विद्याशुभना शकरं।।
करचूर्नित छेदिपभूरिभगं।
भगभूषणको च्चतपादयुगं।।
युगनायक नागरवेशरुचिं।
रुचिरांशुपिधानशरीरशुचिं।।
शुचिचामरवायुनिसेव्यतुं।
तनु मध्यगदेहसुवेशहनुं।।
हनुमन्त हरीशसहायरतं।
रतरांगपरायनशत्रुनतं।।
नतवरत्र्तूलस्थुल सूदीर्घभुजं।
भूजगाधिपनल्पशयानमजं।।
अजरामरविग्रह विश्व गुरुं।
गुरुगोधनकामदकल्पतरुं।।
तरुणीमनमोहनसव्र्वशुभं।
शुभमंगलदायकनीलनिभं।।
इभकुम्भमौक्तिकमाल्यवहं।
वदलोरसमिष्टज सव्र्वसहं।।
सहजायतिपद्मदलचिदं।
चिदानंदविनोदनवेदविदं।।
विदुषान्मनमण्डणकम्बुगलं।
गलसोभितकौस्तसभीमबलं।।
वलभद्रसहोदरसत्यवपुं।
वपुनिर्द्दितविश्वसुरारिरिपुं।।
रिपुयूथपयुथपदर्पहरं।
हरमौलिनिघृष्टपदाफ्रजपरं।।
परलोकसहायसहस्त्रमुखं।
मुखरालिकुलाकुलमाल्यसुखं।।
सुखमोक्षददक्षर मारमणं।
मनसोपरिमेयसहस्त्र प्रणम्।।
प्रणतोस्मि नतोस्मि नतोस्मि हरिं।
हरि किंकर शंकर ईशपदे।
हरि किंकर शंकर ईशपदे।
पदमिच्छन गायति चामृतदे।।
(जगत गुरु श्रीमंत शंकरदेव रचित संस्कृत देव भटिमा। त्रोटक छन्द में रचित हैं औ इसीलिए असमीया भाषा में तोटय नाम सें जाना जाता हैं)
